शीर्षक : कुछ ही देरी है | ✍️ रेखा प्रजापति - अहमदाबाद




आज कदमों में कुछ तेजी है |


 आज सांसे भी कुछ गहरी है |


 दोपहर से आंखें राह तक रही है |


 उसके आने में अब कुछ ही देरी है |



 आज धड़कनों को भी कुछ जल्दी है|


 बेवजह चेहरे पर मुस्कान बिखरी है|


 शाम से नजर दरवाजे पर टिकी है|


उसके आने में अब कुछ ही देरी है |



आज खाने की थाली कुछ ज्यादा भरी है|


कई दिनों से हथेली ठिठुर रही है |


खामोश रात हमसे कुछ कह रही है |


उसके आने में अब कुछ ही देरी है |


 रेखा प्रजापति

 अहमदाबाद 

2/3/2021

Comments