शीर्षक - नाम ✍️ हेमा बाजपेई , अहमदाबाद
कहने को तो हर इंसा का नाम हे मजहब में,
पर ना जाने क्यों अक्सर नाम से ज्यादा काम से बुलाई जाती हूं मैं... ..
कहने को तो हर शख्स की पहचान है ये नाम,
पर ना जाने क्यों खुद से कभी रुबरु ना कराता ये नाम....
कभी बाबा की बेटी तो कभी पति की पत्नी बन के रह जाती हू में,
अब बोलो नाम का जिक्र भी कहां हो पाता है......
बोलते तो सभी है तुम्हारा नाम ही तुम्हारी पहचान है, पर पहचान बनने से पहले ही एहसान तले दबा जाती हूं मैं.......
कहने को तो नाम एक डोर है जो थामे बैठा हैं वो पल जो पहचान करवाना चाहता है खुद से,
पर रुसवा आंखों से कभी मुलाकात भी कहां करवा पाता है...
कहने को तो ये नाम नहीं इंसा की पहचान है पर खुद से रुबरु होने भी कहां दे पाता हैं.......
हेमा बाजपेई
अहमदाबाद

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